हसीना की दस्तकरात धीरे-धीरे अपनी नमी फैला रही थी।बाहर आसमान जैसे किसी पुराने ज़ख्म की तरह गरज रहा था —बिजली की चमक हर कुछ मिनट में कमरे की दीवारों पर नाच जाती।बारिश की बूँदें खिड़की के शीशे पर टिक-टिक करतीं,और उस आवाज़ में एक अजीब सुकून भी था और एक अजीब बेचैनी भी।शहर की सड़कें खाली थीं —लैम्पपोस्ट के नीचे गिरती बूँदें सुनहरी लग रही थीं,और हवा के झोंकों से सूखे पत्ते इधर-उधर भाग रहे थे।---✈️ अजय — उड़ान का आदमी, ज़मीन पर तन्हाअजय खिड़की के पास खड़ा था।उसकी आँखों में एक थकान थी — वो थकान जो सफ़र से नहीं, ज़िंदगी से आती है।कुछ महीने पहले ही उसे एयरलाइन में नौकरी मिली थी।
अंजान - 1
️ अंजान लेखक: राज फुलवरे️ भाग 1 — हसीना की दस्तकरात धीरे-धीरे अपनी नमी फैला रही थी।बाहर आसमान जैसे पुराने ज़ख्म की तरह गरज रहा था —बिजली की चमक हर कुछ मिनट में कमरे की दीवारों पर नाच जाती।बारिश की बूँदें खिड़की के शीशे पर टिक-टिक करतीं,और उस आवाज़ में एक अजीब सुकून भी था और एक अजीब बेचैनी भी।शहर की सड़कें खाली थीं —लैम्पपोस्ट के नीचे गिरती बूँदें सुनहरी लग रही थीं,और हवा के झोंकों से सूखे पत्ते इधर-उधर भाग रहे थे।---️ अजय — उड़ान का आदमी, ज़मीन पर तन्हाअजय खिड़की के पास खड़ा था।उसकी आँखों में एक ...और पढ़े
अंजान - 2
अंजान भाग 2लेखक: राज फुलवरेअध्याय एक — वापसीरात फिर वही थी — बरसात, हवा, और वह सन्नाटा जो किसी बात की तरह दीवारों में अटका हुआ था.अजय की आँखें कई दिनों से ठीक से बंद नहीं हुई थीं.कॉफी का कप मेज पर ठंडा पडा था, टीवी बंद था, और खिडकी से टपकती बूँदें जमीन पर गीले निशान बना रही थीं.हर बार जब बिजली चमकती, वो एक पल को उस चेहरे को देखता —वही भीगी हुई लडकी, सफेद कपडों में, काँपती हुई,और फिर — आईने पर उभरते वे शब्द —>“ थोडी देर रुकने आई थी.उसकी रूह काँप जाती थी.क्या यह ...और पढ़े