बप्पा रावल जिसे कालभोज के नाम से भी जाना जाता है।8वीं शताब्दी में मेवाड़ (वर्तमान राजस्थान) के एक पराक्रमी शासक थे। उन्हें गुहिल राजवंश का संस्थापक माना जाता है और उन्हें भारत पर अरबों के आक्रमण को विफल करने का श्रेय दिया जाता है। बप्पा रावल, जिन्हें कालभोज, शिलादित्य और खुमाना के नामों से भी जाना जाता है। बप्पा रावल को मेवाड़ के सबसे शक्तिशाली और प्रसिद्ध शासकों में से एक माना जाता है। उनकी वीरता और पराक्रम के कारण अरबों ने 400 वर्षों तक भारत पर आक्रमण करने का साहस नहीं किया। बप्पा रावल ने अपने जीवन के अंत में संन्यास ले लिया था।
Full Novel
श्री बप्पा रावल - 1 - तथ्यात्मक विश्लेषण
तथ्यात्मक विश्लेषणवैसे तो जिन पात्रों की मैं कथा सुनाने जा रहा हूँ। उनके विषय में बहुत ही कम पुस्तकें को मिलती हैं, जिसके कारण कई इतिहासकार इन्हें लेकर अलग-अलग कथाऐं कहते हैं। एकलिंग महातम्य के साथ-साथ कुमम्भलगढ़, आबू, कीर्ति स्तम्भ और रणकपुर के शिलालेखों में तो बप्पा रावल का उल्लेख मिलता ही है, बाकि इंटरनेट और यू ट्यूब के कई चैनलों पर इन पात्रों की जानकारी भी मिल जायेगी, जहाँ हर कोई अलग-अलग तरीके से बप्पा रावल और उनसे जुड़े पात्रों की कथा सुनाता है।जहाँ तक सिंध के इतिहास की बात है तो उसकी व्याख्या मुख्यतः तेरहवीं सदी में ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 2 - ब्राह्मणाबाद की विजय
प्रथम अध्यायब्राह्मणाबाद की विजयरण में शवों के ढेर के बीचों बीच तीन-तीन विकराल अश्व और उस पर सवार हुए हाकिम अपने-अपने हाथों में तलवारें और भाले संभाले तीन सौ गज की दूरी पर पंद्रह अरबी सैनिकों से अकेले लोहा लेते हुए एक वीर की ओर बढ़े चले जा रहे थे। दो अरबी सैनिकों की गर्दनों को तलवार के एक ही प्रहार से उड़ाते हुए उस वीर योद्धा के शिरस्त्राण पर लगे रक्त के साथ माथे पर लगा चंदन का अमिट तिलक उसके सूर्य समान तेजस्वी मुखमंडल की शोभा बढ़ा रहा था। उस वीर के मुख से लेकर ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 3 - सिन्धी गुप्तचर दल
द्वितीय अध्यायसिन्धी गुप्तचर दलहिन्द-सेना ब्राह्मणाबाद के किले की रक्षा में सफल हो चुकी थी। पूरे नगर के सबसे ऊँचे की चोटी पर हिन्द-सेना के गौरव का प्रतीक केसरिया ध्वज वायु के बहते प्रवाह के समक्ष अपना सर ऊँचा किये यूँ लहरा रहा था मानों चारों दिशाओं को अपने प्रभुत्व का संकेत भेज रहा हो।शीघ्र ही किले का विशाल द्वार खुला और पुष्प वर्षा से सभी प्रमुख वीरों का स्वागत हुआ। सिंध नरेश महाराज दाहिर, कन्नौज नरेश नागभट्ट, मेवाड़ नरेश मानमोरी के साथ कंधे से कंधा मिलाता हुआ कालभोज (बप्पा रावल) गर्व से सीना ताने किले के भीतर चला आ ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 4 - कालभोजादित्य रावल (बप्पा रावल)
तृतीय अध्यायकालभोजादित्य रावलकुछ दिनों की यात्रा के उपरान्त कालभोज (बप्पा रावल) नागदा ग्राम की सीमा पर आया। भीलों के के साथ चलते हुए अकस्मात ही उसने अपने अश्व की धुरा खींच उसे रोककर बाकि भीलों से कहा, “आप लोग चलिए मैं आता हूँ।”भीलों ने गाँव के भीतर प्रवेश किया। वहीं कालभोज ने अपना अश्व दूसरी दिशा में मोड़ लिया। कुछ कोस दूर चल वो एक नदी के पास रुका। अपने अश्व से उतरकर वो तट पर पहुँचा और अपने सर पर रखा शिरस्त्राण उठाए उसके भीतर देखा। उसके भीतर चंदन की एक डिबिया यूँ गुदी हुई थी मानों वो ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 5 - कासिम की योजना
चतुर्थ अध्याय कासिम की योजना[इराक की राजधानी (बगदाद)]चार ऊँटों को अखाड़े में लाया गया। ऊपर बैठे दर्शकों की तालियों गड़गड़ाहट के बीच अपने मुख को काले नकाब से ढके एक योद्धा ने अखाड़े में प्रवेश किया। ऊँचे कंधे और चौड़ी छाती वाले उस योद्धा ने श्वेत रंग की धोती पहन रखी थी। काली पगड़ी और उससे जुड़े उसके चेहरे को छुपाये नकाब के बीच उसकी चमकीली आँखें उन ऊँटों पर केंद्रित थीं। अपने बायें हाथ में रखे एक बड़े से पात्र में हरे रंग का पदार्थ लिए वो आगे बढ़ा। उस पदार्थ से निकलता हरे रंग का धुआँ चहुं ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 6 - महाशिवरात्रि उत्सव
पंचम अध्यायमहाशिवरात्रि उत्सवमुहम्मद बिन कासिम सिंध को जीतने के अभियान पर निकल पड़ा। दस तालुकदारों ने सिंध के महाराज को सुल्तान अलहजाज का संदेश देते हुए सिंध से अपनी सारी सैनिक चौकियाँ हटा लीं। सिंध के नगर अलोर की घेराबंदी भी हटा ली गयी। साथ ही योजना के अनुसार सारे तालुकदारों को देबल के सूबेदार ज्ञानबुद्ध ने अपने नगर में छुपा लिया। पंद्रह हजार अरब सेना अलग-अलग टुकड़ियों में बँटकर सौदागर बनकर भारतवर्ष के कोने-कोने में फैलने लगी थी। वहीं मुहम्मद बिन कासिम भेष बदल बदलकर छुपते छुपाते भारतवर्ष में फैले अपने सारे सौदागर टुकड़ियों से मिलता रहा। धीरे-धीरे ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 7 - कांचीपुरम का युद्ध
षष्ठम अध्यायकांचीपुरम का युद्धअगले दिन प्रातः काल शस्त्राभ्यास के उपरान्त कालभोज ने अखाड़े के बाहर रखा मटका उठाया और उसमें भरा जल पी गया। किन्तु अभी उसने मटका नीचे रखा ही था बेड़ियों में जकड़े एक मनुष्य को घसीटते हुए उसके कदमों में ला पटका गया। भोज ने दृष्टि उठाकर देखा, कि उसे लाने वाले कोई और नहीं हरित ऋषि और भीलराज बलेऊ थे।उसने अपने गुरु को प्रणाम करते हुए प्रश्न किया, “ये सब क्या है, गुरुदेव?”हरित ऋषि ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर हाथ रखा, “युद्ध की विभीषिका बड़ी भयानक होती है, वत्स कालभोज। जब किसी योद्धा की ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 8 - भोजकश में प्रेम पड़ाव
सप्तम अध्यायभोजकश में प्रेम पड़ावअगले दो दिवस में ही मेवाड़ की सम्पूर्ण सेना ने विजयपुरा की भूमि छोड़ दी। विन्यादित्य भी अपने दल बल के साथ बादामी लौट आये। थोड़े विश्राम के उपरान्त उन लोगों ने पूरे महिष्कपुर को अपने आधीन करने की योजना बनानी आरम्भ की। और महाराज विन्यादित्य के आदेश पर शीघ्र ही नागादित्य और शिवादित्य अपनी सैन्य टुकड़ी लेकर महिष्कपुर के विभिन्न नगरों के शासकों को बल या वार्ता के प्रयोग से चालुक्यभूमि का भाग बनाने के उद्देश्य से निकल पड़े।तीन वर्ष और बीते। दोनों गुहिल योद्धाओं ने लगभग सम्पूर्ण महिष्कपुर को चालुक्यों के आधीन कर ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 9 - भीलों की समस्या
अष्टम अध्यायभीलों की समस्याएक मास के भीतर ही शुभ महूर्त देखकर गुहिलवंशी नागादित्य और राजकुमारी मृणालिनी का विवाह सम्पन्न विवाह के कुछ दिनों के उपरान्त वो मेवाड़ी सेना की एक छोटी टुकड़ी लिए नागदा में आये। नागदा की सीमा में प्रवेश करते ही राजपथ पर उन पर पुष्प वर्षा आरम्भ हुई किन्तु नागादित्य को ये देख बड़ा आश्चर्य हुआ कि अधिकतर प्रजाजनों के मुख पर प्रसन्नता की कोई भावना नहीं दिखाई दे रही थी। मृणालिनी को भी शीघ्र ही प्रसन्नता का स्वांग करते सामान्य जनों के मन में दबे क्रोध का आभास हो गया। नागादित्य ने अपनी भार्या को ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 10 - निष्कासन
नवम अध्यायनिष्कासनबादामीहाथ में भाला लिए दौड़ता हुआ एक सैनिक नदी के तट पर सूर्यवंदना समाप्त कर रहे शिवादित्य के आया।उसे घबराया हुआ देख शिवादित्य नदी से निकलकर बाहर आया, “क्या बात है?”“आपकी पत्नी, देवी शत्रुपा..। वो संकट में हैं।”शिवादित्य का ध्यान उस सैनिक के मस्तक से बहते रक्त की ओर गया, “ये चोट तुम्हें किसने दी? हो क्या रहा है यहाँ?”“आपके महल में पधारे अतिथि, महाराज विन्यादित्य के पुत्र कुमार जयसिम्हा ने आपकी पीठ में कटार घोंपी है, महामहिम।”उस सैनिक का ये कथन सुन शिवादित्य ने भौहें सिकोड़ते हुए उसका जबड़ा पकड़ लिया, “असत्य कह रहे हो तुम, सम्भव ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 11 - मित्रघात
दशम अध्यायमित्रघातमहिष्कपुर में शिवादित्य एक-एक पल्लव विद्रोही को ढूंढ ढूंढकर समाप्त करता रहा। इधर महाराज नागादित्य ने नागदा की व्यवस्था को दृढ़ किया और अपने परिवार समेत अमरनाथ की यात्रा की ओर चल पड़े। योजनानुसार विष्यन्त ने अपनी पत्नी और बच्चों को भी उनके साथ भेज दिया।जिस दिन नागदा नरेश अमरनाथ से अपने राज्य लौटने वाले थे, उससे ठीक एक दिवस पूर्व की रात्रि विष्यन्त ने नागदा से चित्तौड़ आए मेवाड़ के मुट्ठीभर सैनिकों को एकत्रित किया और उन्हें लेकर गुप्त कन्दराओं से होकर भीलों के क्षेत्र में पहुँचा। बहुत से भील गहन निद्रा में थे, और कुछ बाहर ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 12 - हरित ऋषि से भेंट
एकादशम अध्यायहरित ऋषि से भेंटचित्तौड़ के महल के प्रांगण में चहलकदमी करते मेवाड़ नरेश मानमोरी बड़ी व्यग्रता से सूचना प्रतीक्षा में थे। मंत्री जलसंघ भी उनके साथ खड़े थे, तभी एक सैनिक दौड़ता हुआ उनकी ओर आया। उसे व्यथित देख मानमोरी के मुख पर मुस्कान आ गयी, “कोई विशेष सूचना?”“नागदा नरेश नागादित्य और उनकी पत्नी मृणालिनी की भीलों द्वारा हत्या कर दी गयी, महाराज।”“मृणालिनी की मृत्यु? ये कैसे सम्भव है?” मानमोरी अचम्भित रह गये। तभी जलसंघ ने मानमोरी के कंधे पर हाथ रख उसे सावधान किया कि कहीं वो आवेश में आकर उस सैनिक के समक्ष अपने रचे षड्यन्त्र ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 13 - सिंधु नदी की रक्त गंगा
द्वादशम अध्यायसिंधु नदी की रक्त गंगाभूरे रंग की चादर ओढ़े व्यापारी जैसा दिखने वाला मनुष्य, मेवों से भरे झोले देबल की तंग गलियों में घूम रहा था। लोग बड़ी रुचि लेकर उससे मेवों की खरीददारी कर रहे थे। तभी चार अश्वारोही शस्त्र ताने उसके निकट आये और उस व्यापारी की गर्दन पर तलवार तानते हुए कहा, “तुम अरब देश से आये हो न?”“जी, जी हुजूर, मुझसे कोई गुस्ताखी हो गयी क्या?” उस व्यापारी ने घबराते हुए कहा।उस अश्वारोही योद्धा ने उसे ऊपर से नीचे तक घूरा, “तुम अरब व्यापारी पिछले दो माह से व्यापार तो बहुत कर रहे हो, ...और पढ़े
श्री बप्पा रावल - 14 - मेवाड़ विजय
त्रयोदशम अध्यायमेवाड़ विजयबादामी में चालुक्यों की राजसभा का रिक्त सिंहासन अपने धारक की प्रतीक्षा में था। उस सिंहासन के सामने एक युवक बेड़ियों में जकड़ा हुआ खड़ा था। उसके निकट खड़े कालभोज और शिवादित्य के साथ अन्य सभासद कदाचित किसी की प्रतीक्षा में थे।शीघ्र ही राजसी वस्त्रों में एक भद्र पुरुष ने छाती चौड़ी कर सभा में प्रवेश किया। सीधा शरीर, ऊँचे कंधे, सुदृढ़ भुजाएँ और कंधे से होते हुए हाथों को अलंकृत किया हुआ राजसी अंगवस्त्र उनके क्षत्रित्व का प्रमाण देने को पर्याप्त थे। मुखमंडल पर सूर्य की आभा लिये वो पुरुष अपने सिंहासन पर विराजमान हुए।शिवादित्य ने ...और पढ़े