रूह, जिस्म और वो

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पहाड़ों की ढलानों पर घने चीड़ के जंगलों के बीच बनी वह पुरानी औपनिवेशिक हवेली पिछले कई दशकों से वीरान पड़ी थी। बाहर सन्नाटे को चीरती बर्फीली हवाएं चल रही थीं और आसमान में बादलों के बीच से आधा अधूरा चांद कभी छिपता तो कभी झांकता। मयूर ने इस हवेली को अपनी रिसर्च के सिलसिले में एक हफ्ते के लिए किराए पर लिया था। उस सुनसान, डरावनी रात में वह लिविंग रूम की चिमनी के सामने बैठा आग ताप रहा था, जब दरवाज़े पर हल्की, लेकिन साफ़ तीन दस्तकें हुईं।मयूर चौंक गया। इतनी रात गए इस वीराने में कौन आ