भाग 9हवेली का असली श्राप“मैं तुम्हारे साथ घर आ गया…”उस बच्चे की मुस्कान देखते ही आरव की साँस रुक गई।पूरा कमरा काले पानी से भरा हुआ था। दीवारों पर बने हाथों के निशान धीरे-धीरे नीचे की तरफ खिसक रहे थे… जैसे किसी ने अभी-अभी उन्हें छुआ हो।आरव की माँ काँपते हुए रो रही थीं।“ये… ये कौन है…?”लेकिन आरव के मुँह से आवाज़ नहीं निकली।उसकी नजर सिर्फ उस बच्चे पर जमी थी।वो कोने में बैठा था।घुटनों को मोड़कर।सिर टेढ़ा किए।और उसकी सफेद आँखें बिना पलक झपकाए सीधे आरव को देख रही थीं।फिर उसने बहुत धीरे से कहा—“तुमने दरवाज़ा खोल दिया…”“न… नहीं…”