तेरहवा द्वार - 5

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भाग 5तहखाने का दरवाज़ा“अगर तुम ये पढ़ रहे हो… तो समझ लो — वो तुम्हें चुन चुकी है।”आरव के हाथ काँप उठे।डायरी के पन्नों से अजीब सी बदबू आ रही थी… जैसे वो कागज़ नहीं, किसी पुरानी कब्र से निकाली गई चीज़ हो।कमरे के चारों तरफ दीवारों में फँसे चेहरे अभी भी धीरे-धीरे हिल रहे थे।कुछ रो रहे थे… कुछ उसे घूर रहे थे।और उन सबकी आँखों में सिर्फ एक ही चीज़ थी—डर।आरव ने काँपते हाथों से अगला पन्ना खोला।लिखावट बहुत खराब थी। जैसे किसी ने डर के मारे जल्दी-जल्दी लिखा हो।“मेरा नाम देवेंद्र है। मैं इस हवेली का नौकर