धोबी

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गंगाराम गाँव का धोबी था।सुबह उठता। कपड़े इकट्ठा करता। नदी किनारे ले जाता। पत्थर पर पटकता। साबुन लगाता। धूप में सुखाता। शाम को इस्तरी करके वापस कर देता।तीस साल से यही कर रहा था।उसके हाथ सख्त हो गए थे। साबुन से उँगलियाँ फट गई थीं। पीठ दर्द करती थी। पर वो कभी नहीं रुका।क्योंकि उसके पास और कुछ नहीं था।न बाप। न माँ। न बीवी। न बच्चे।बस कपड़े और उसकी टोकरी।गाँव वाले उसे जानते थे। पर कोई उससे दोस्ती नहीं करता था। क्योंकि धोबी का छूना अशुभ माना जाता था। कपड़े तो दे देते थे। पर चाय नहीं पिलाते थे।