वो ठेला वाला जिसकी चाय पीके कोई वापस घर नहीं पहुंचा

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गाँव के चौराहे पर ठेला लगाता था भैरू। छोटा सा ठेला था। चाय की केतली। पान की दुकान। कुछ बिस्कुट के पैकेट। लोग आते थे। चाय पीते थे। अखबार पढ़ते थे। भैरू की चाय गाँव में मशहूर थी। एक कप चाय में उतनी इलायची डालता था जितनी कोई नहीं डालता। बस यही था उसकी दुनिया। सुबह से रात तक ठेले पर। गर्मी हो या सर्दी। बारिश हो या धूप। भैरू अकेला था। उसकी कोई नहीं थी। न बीवी, न बच्चे, न कोई अपना। उसका घर ठेले के पीछे ही था। एक छोटी सी झोपड़ी। जहाँ वो सोता था। और सुबह