भाग 1शापित हवेलीरात के ठीक 3 बजकर 13 मिनट हुए थे।पूरा गाँव गहरी नींद में डूबा हुआ था। बाहर तेज़ हवा चल रही थी। पेड़ों की सूखी शाखाएँ एक-दूसरे से टकराकर अजीब आवाज़ें निकाल रही थीं। आसमान में बादल इतने काले थे कि चाँद की रोशनी भी ज़मीन तक नहीं पहुँच पा रही थी।लेकिन उस रात…गाँव के आखिरी छोर पर बनी पुरानी हवेली की तीसरी मंज़िल की एक खिड़की में फिर से रोशनी जली थी।ठीक वैसे ही… जैसे पिछले कई सालों से हर रात जलती थी।“काली हवेली…”गाँव वाले आज भी उसका नाम लेते हुए काँप जाते थे।कहते थे — उस