बिहार की राजधानी पटना से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर, भोजपुर और बक्सर की सीमाओं के बीच बसा एक छोटा और उपेक्षित सा गांव है—अकबरपुर। यह वो गांव था जहां की जमीन पर साल के अधिकांश महीनों में धूल उड़ती रहती थी और गर्मियों के दिनों में लू के थपेड़े हवा में चीखते हुए से महसूस होते थे। इस गांव के रास्ते तंग और कच्चे थे, जिन पर बैलगाड़ियों के पहियों के गहरे निशान सदियों की बेबसी की कहानी बयां करते थे। गांव के बीचों-बीच एक पुराना, विशालकाय नीम का पेड़ हुआ करता था, जिसकी घनी छांव के नीचे गांव के बुजुर्ग हुक्का गुड़गुड़ाते हुए मौसम, फसल और राजनीति पर पंचायत किया करते थे।
आई पी एस ओजस्विनी - 1
बिहार की राजधानी पटना से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर, भोजपुर और बक्सर की सीमाओं के बीच बसा एक छोटा उपेक्षित सा गांव है—अकबरपुर। यह वो गांव था जहां की जमीन पर साल के अधिकांश महीनों में धूल उड़ती रहती थी और गर्मियों के दिनों में लू के थपेड़े हवा में चीखते हुए से महसूस होते थे। इस गांव के रास्ते तंग और कच्चे थे, जिन पर बैलगाड़ियों के पहियों के गहरे निशान सदियों की बेबसी की कहानी बयां करते थे। गांव के बीचों-बीच एक पुराना, विशालकाय नीम का पेड़ हुआ करता था, जिसकी घनी छांव के नीचे गांव के ...और पढ़े