खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध

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रावल खुमाण द्वितीय 9वीं सदी में मेवाड़ के गहलोत वंश के शासक थे जो अरब आक्रमणों के खिलाफ हिंदू धर्म की सबसे बड़ी ढाल बने। उन्होंने भीनमाल के राजा नागभट्ट के साथ मिलकर सेनापति हाशिम की सेना को हराकर अरबों को दशकों तक भारत से दूर रखा। उनकी सबसे बड़ी जीत अरब सेनापति अल मामू उर्फ महमूद के खिलाफ थी, जिसे उन्होंने युद्ध में हराकर बंदी बना लिया और भविष्य में आक्रमण न करने का प्रण लेकर ही छोड़ा। खुमाण ने कश्मीर से रामेश्वरम तक 40 हिंदू राजवंशों को एकजुट करके एक विशाल सेना खड़ी की और अरबों को निर्णायक रूप से पराजित किया। उनके कारण भारत लगभग 500 वर्षों तक अरब आक्रमणों से सुरक्षित रहा। इतिहासकार मानते हैं कि अगर खुमाण हार जाते तो इस्लाम का प्रसार चीन और सुदूर पूर्व तक हो सकता था। इतने बड़े योगदान के

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खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - भूमिका

यह पुस्तक “महाराणा: सहस्र वर्षों का धर्मयुद्ध” मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश द्वारा सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की रक्षा लिए लड़े गए 1000 वर्ष के निरंतर संघर्ष का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक बप्पा रावल से लेकर महाराणा प्रताप तक के योद्धाओं के अटूट साहस को रेखांकित करते हुए प्रचलित इतिहास लेखन में उपेक्षित नायकों के गौरवशाली इतिहास को उजागर करती है। यह पुस्तक इतिहास के प्रति एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है, जो हर पाठक के लिए आवश्यक है। ...और पढ़े

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खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - 1.. बाप्पा रावल : मेवाड़ के संस्थापक राजा

1.. बाप्पा रावल : मेवाड़ के संस्थापक राजा(728-758 ईसवी)पिता नागादित्य एवं माता कमलावती के पुत्र बाप्पा, गुहिलोत वंश के थे। उनका जन्मनाम कालभोज था। प्रजा के संरक्षक व राष्ट्र के रक्षक होने के नाते मेवाड़ के लोगों ने उन्हें प्रेम से ‘बाप्पा’ अर्थात् पिता की उपाधि दी। जो कालांतर में उनका नाम ही बन गई।गुहिलोत वंश, श्रीराम के पुत्र लव के वंशजों में से आता है और कालांतर में यह गुहिलोत वंश ही शक्तिशाली सिसोदिया वंश बना, जो 1,400 वर्षों से मेवाड़ पर राज कर रहा है एवं आज भी उदयपुर के राजा इसी महिमाशाली वंश से हैं।बाप्पा का ...और पढ़े

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खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - 2

2.. रावल खुमाण : अरबों का काल(820-860 ईसवी)खुमाण बाप्पा रावल के सीधे वंशज थे। यद्यपि उनके बीच चार से पीढ़ियों का अंतर था। आठवीं से दसवीं शताब्दी के मध्य मेवाड़ में तीन भिन्न-भिन्न रावल खुमाण होने का उल्लेख है। तीनों ही इस्लाम के प्रसार के विरोध में हिंदू ढाल बनकर जिए। किंतु इनमें खुमाण द्वितीय सर्वाधिक प्रसिद्ध हुए।खुमाण के विषय में लिखित ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम मिलते हैं। इस महान राजा के विषय में जानकारी राजस्थानी भाषा में देवनागरी लिपि के पाँच हजार दोहों में लिपिबद्ध ‘खुमाण रासो’ नाम के ग्रंथ से प्राप्त होती है। इस ग्रंथ के माध्यम ...और पढ़े

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खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - 3

3.. रावल जैत्र सिंह : नागदा का नाश व इल्तुत्मिश की पराजय(1213-1253 ईसवी)रावल जैत्रसिंह का जीवन एवं कार्य तीन से विशेष रहा। प्रथम, रावल जैत्र सिंह तेरहवीं शताब्दी में अफगानों एवं तुर्क आक्रमणकारियों के विरुद्ध हिंदू संघां में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी रहे।बाप्पा रावल, खुमाण तथा शक्ति कुमार की इस्लामी आक्रांताओं के विरुद्ध विजय-यात्राओं के पश्चात् रावल जैत्र सिंह ने इस संघर्ष को जीवित रखा।द्वितीय, जैत्र सिंह की विभिन्न युद्धों में विजय के परिणाम स्वरूप दिल्ली सल्तनत नाम का झूठ पुनः खुलकर सामने आ जाता है। पराजित मुसलमान लुटेरों को सुल्तान बताने में इस देश के इतिहासकारों को लज्जा भी ...और पढ़े

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खण्ड - 01 महाराणा सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध - 4

4.. महारानी प‌िद्मनी और रावल रतन सिंहः खिलजी द्वारा चित्तौड़ का नाश व पहला साका जौहर (1303 ईसवी)रावल रतन रावल समर सिंह के पुत्र थे, जो असाधारण और शूरवीर राजा थे। रावल रतन सिंह की एक अप्रतिम सुंदर पत्नी थी, जिनका नाम था रानी पद्मिनी। पद्मिनी, जो कि मेवाड़ की महारानी भी थीं, उनकी सुंदरता एवं उसी सुंदरता के प्रति अलाउद्दीन खिलजी की वासना के विषय में बहुत कुछ लिखा और अनुमान लगाया गया है। यह निश्चित है कि चित्तौड़ की पहली घेराबंदी और पहला साका जौहर, अलाउद्दीन खिलजी की पाशविक वृत्ति के कारण ही हुआ।रतन सिंह और पद्मिनी ...और पढ़े

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