सूरज डूबने में कुछ क्षण शेष थे, सुनहरी किरणें पश्चिम के क्षितिज पर बिखरी नज़र आ रही थी। हवा के झोंके अपने मंद प्रवाह के साथ फूलों की महक ला रहे थे। उन झोंकों में महक भी थी और शीतलता भी। चैत की उदास, शांत और मासूम-सी शाम थी। मैं धीरज के साथ मंदिर के बाग़ में बैठा था। दिल कुछ भारी था और मन कुछ उदास था। एक अजीब-सा खालीपन लग रहा था, हृदय में एक टीस-सी उठ रही थी। समय के प्रवाह के साथ सुकून कहीं बह गया था। वसंत की उपस्थिति के बाद भी सब रूखा और निरस-सा लग रहा था।
प्रेम पल्लवी - 1
दो शब्द।बहुत सोचने के बाद भी मुझे कुछ नहीं सुझा इसलिए यह कविता लिख रहा हूँऔर फिर…. प्रेम परिणय नहीं पहुँचता!वह रह जाता है….उस ललित कुंज के उपवन में,स्मृति बन….!जहाँ नयनों से नयन मिलें थे,चंद्र की दीप्ति में कुसुम खिले थे।वह ललित उपवन बीहड़ बन जाता….!प्रेम फिर परिणय नहीं बनता,वह स्मृति बन जातासत्यवीर सिंह जेतुंगप्रेम पल्लवी-१सूरज डूबने में कुछ क्षण शेष थे, सुनहरी किरणें पश्चिम के क्षितिज पर बिखरी नज़र आ रही थी। हवा के झोंके अपने मंद प्रवाह के साथ फूलों की महक ला रहे थे। उन झोंकों में महक भी थी और शीतलता भी। चैत की उदास, ...और पढ़े
प्रेम पल्लवी - 2
२सुबह की ताज़ा धूप सुकुमार कलियों के साथ खेल रही थी। हवा का प्रवाह धीमा था और उसमें फूलों सुगंध घुली थी। उस ठंडी नसीम में सुबह की ताज़गी भरी थी; वह जिस तरफ़ से निकलती, उस तरफ़ के पेड़ों की कलियाँ खिल उठतीं। उस हवा के झोंके का स्पर्श इतना नन्हा, कोमल और शरारती था कि कान में ऐसी गुदगुदी करता कि मन खिल उठता!मैं उठा ही था कि पिताजी ने दो हज़ार रुपये मेरी जेब में डालते हुए कहा, "ये रुपये दीनदयाल को दे आओ।" मैं कारण पूछता, उससे पहले ही उन्होंने कहा, "घर में सब्ज़ी का ...और पढ़े
प्रेम पल्लवी - 3
आधा रास्ता लाज भरी खामोशी में तय हो चुका था। सन्नाटा इतना गहरा था कि हमारे पैरों की आहट सुनाई दे रही थी। मेरे बोलने के तमाम प्रयास विफल हो चुके थे। शब्द होठों तक आते और ठहर जाते।मैं पल्लवी से दो कदम आगे था; वह मेरे बराबर आई और बोली, "प्रसाद ले लीजिए।"बातचीत की शुरुआत औपचारिकता से होती है और प्रेम की आकर्षण से; और यह औपचारिकता ही आकर्षण को प्रेम बनाती है। पल्लवी ने खामोशी तोड़ दी थी।"हाँ, लाओ।" मैंने कहा और उसने प्रसाद मुझे दे दिया। "क्या मन्नत थी जो आज पूरी हो गई?" मैंने कुछ ...और पढ़े