झांसी: सौदा, कर्ज और बदला

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कर्ज़ की दस्तक गाँव में शाम हमेशा जल्दी उतर आती थी।सूरज अभी पूरी तरह डूबा भी नहीं था, लेकिन प्रताप सिंह बाजवा के घर में अंधेरा पहले ही पसर चुका था। आँगन के बीच रखा मिट्टी का दिया बार-बार काँप रहा था—जैसे हवा नहीं, डर उसे हिला रहा हो। गुणवती बाजवा ने तीसरी बार दरवाज़े की ओर देखा।उसकी आँखों में वही घबराहट थी, जो हर उस औरत की होती है जो आने वाली मुसीबत को पहचान चुकी हो।“आज फिर…?”उसके होंठ हिले, पर शब्द अधूरे रह गए। खाट के किनारे बैठे प्रताप सिंह ने कोई जवाब नहीं दिया।उनके कंधे झुके हुए थे, जैसे जिंदगी का बोझ अब उठाए नहीं उठ रहा।

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झांसी: सौदा, कर्ज और बदला - 1

“कुछ कर्ज़ पैसों से नहीं चुकते… उनकी कीमत ज़िंदगी होती है। एक मजबूर बाप… एक टूटा हुआ घर… और एक बेटी—जिसकी खामोशी ही मंज़ूरी बन जाती है। जब भार्गवी को कर्ज़ चुकाने के लिए सौदे में दुल्हन बनाकर भेजा जाता है, तो सबको लगता है कि एक और लड़की हार गई। लेकिन सच क्या है? क्या वो सच में बेबस है… या उसी खामोशी के पीछे छुपा है एक ऐसा तूफ़ान जो पूरे सिस्टम को हिला देगा? ‘झांसी’ सिर्फ़ एक नाम नहीं— एक चेतावनी है। जहाँ रिश्ते सौदे बन जाते हैं, और दुल्हन… एक खेल की सबसे खतरनाक खिलाड़ी। ये सिर्फ़ एक प्रेम क ...और पढ़े

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झांसी: सौदा, कर्ज और बदला - 2

Episode 2: सौदे की सुबहरात खत्म हुई…पर उस घर में अंधेरा अभी भी बाकी था।आँगन में ठंडी हवा चल थी,लेकिन भीतर—हर साँस भारी थी।गुणवती की आँखें पूरी रात नहीं लगीं।वो बस अपनी बेटी को देखती रही…जैसे हर पल उसे याद कर लेना चाहती हो।कोने में बैठे प्रताप सिंह चुप थे।इतने चुप कि जैसे आवाज़ देना भी भूल गए हों।और भार्गवी…वो खिड़की के पास खड़ी थी।आसमान में हल्की रोशनी फैल रही थी—एक नई सुबह का इशारा।लेकिन उसके लिए…ये कोई नई शुरुआत नहीं थी।ये एक फैसले की सुबह थी।“दीदी…”नक्षत्रा की नींद भरी आवाज़ आई।भार्गवी ने मुड़कर उसे देखा।वो भागकर उसके पास ...और पढ़े

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झांसी: सौदा, कर्ज और बदला - 3

Episode 3: अनजाना रिश्ता, छुपा हुआ खेलशाम ढल चुकी थी।राठौड़ हवेली रोशनी से जगमगा रही थी—बाहर से सब कुछ भव्य… पर भीतर का माहौल अजीब-सा ठंडा था।गाड़ी जैसे ही हवेली के बड़े दरवाज़े के सामने रुकी,भार्गवी ने पहली बार उस जगह को ध्यान से देखा।ऊँची-ऊँची दीवारें…भारी लोहे का गेट…और अंदर—हर कोने पर खड़े लोग।ये घर कम…एक किला ज़्यादा लग रहा था।“उतरिए,”मिहिर की ठंडी आवाज़ आई।भार्गवी बिना कुछ कहे नीचे उतरी।उसका दुपट्टा हवा में हल्का-सा लहराया—पर उसकी चाल में कोई हिचक नहीं थी।जैसे वो यहाँ आई नहीं…बल्कि किसी मकसद से आई हो।अंदर कदम रखते ही—ढोल-नगाड़ों की आवाज़ गूंज उठी।“राठौड़ परिवार ...और पढ़े

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झांसी: सौदा, कर्ज और बदला - 4

Episode 4: जाल बिछ चुका हैरात गहरी हो चुकी थी।हवेली के गलियारे अब और भी सुनसान लग रहे थे।भार्गवी कमरे में वापस आ चुकी थी—लेकिनउसकी आँखों में नींद नहीं…योजना चल रही थी।वो खिड़की के पास खड़ी थी,जब अचानक— फोन वाइब्रेट हुआ।उसने तुरंत फोन उठाया।स्क्रीन पर कोई नाम नहीं था।बस एक नंबर।उसने बिना हिचक कॉल रिसीव की।“हेलो…”दूसरी तरफ से धीमी, लेकिन सख्त आवाज़ आई—“हवेली में घुस गई हो…”भार्गवी की आँखें हल्की सिकुड़ीं।“हाँ।”“अब बस…शिकार के लिए जाल बिछाना बाकी है।”कुछ सेकंड की खामोशी।“और याद रखना—एक गलती… और सब खत्म।”कॉल कट।भार्गवी ने फोन नीचे किया।उसके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई। “खेल शुरू ...और पढ़े

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झांसी: सौदा, कर्ज और बदला - 5

Episode 5: जाल का मालिक… और छुपा हुआ सचरात का सन्नाटा हवेली को अपनी गिरफ्त में ले चुका था।हर बंद… हर आवाज़ थमी हुई…लेकिन इस खामोशी के पीछे— एक खेल चल रहा था।भार्गवी अपने कमरे की खिड़की के पास खड़ी थी।उसकी आँखें अंधेरे को चीरती हुई दूर कहीं देख रही थीं—जैसेवो सिर्फ देख नहीं रही… नियंत्रण कर रही हो। फोन वाइब्रेट हुआ।उसने बिना देर किए कॉल उठाया।“Status?”दूसरीतरफ से तुरंत जवाब आया—“सभी लोग अपनी position पर हैं, Boss।”उसकी आँखों में हल्की-सी चमक आई।“Target?”“Movement शुरू हो चुका है… लेकिन अंदर से confirmation चाहिए।”कुछ सेकंड की खामोशी।फिर—“कोई गलती नहीं होनी चाहिए,”उसकी आवाज़ ...और पढ़े

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झांसी: सौदा, कर्ज और बदला - 6

Episode 6:“जाल, जज़्बात और पहला वार”रात का सन्नाटा…राठौड़ हवेली के हर कोने में कुछ छुपा हुआ था। वो शिकारी अपने शिकार में कभी नहीं चुका।लेकिन आज… शिकार नहीं… शिकारी जाग चुका था।भार्गवी बालकनी में खड़ी थी।फोन उसके हाथ में था… और आँखों में ठंडा इरादा। Unknown Call…उसने बिना झिझक कॉल उठाया।“हाँ, बोलो।”दूसरी तरफ से आवाज़ आई—“Boss… हवेली में entry हो चुकी है।अब बस जाल बिछाना बाकी है।” आप बस ऑर्डर दे बॉस।भार्गवी की आँखों में हल्की चमक आई।“Good…इस बार कोई गलती नहीं होनी चाहिए।”“जी Boss।” कॉल कट। (Inner Voice)“ये खेल अब खत्म होगा…और इस बार… कोई बचकर नहीं जाएगा।”अचानक ...और पढ़े

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