सुनीति ऑफिस से वापस आती है। उसके चेहरे पर थकान और उदासी साफ झलक रही है। आज ऑफिस में बॉस ने उसे डाँट दिया था। पहली बार उसे अपने आप पर भरोसा टूटा हुआ लगा। कमरे में आते ही वो ज़मीन पर बैठ जाती है और बच्चों की तरह रोने लगती है। सुनीति (रोते हुए) बोली - “मैं इतनी कोशिश करती हूँ… फिर भी सब मुझसे नाराज़ क्यों रहते हैं? क्या मैं सच में इतनी कमज़ोर हूँ?” अचानक उसके सामने टेबल पर एक सफेद रूमाल रखा हुआ दिखता है, जो कुछ देर पहले वहाँ नहीं था। सुनेति (चौंककर, धीरे से) बोली - “ये… ये रूमाल कहाँ से आया?”
Full Novel
अदृश्य पीया - 1
दिल्ली की बड़ी सड़कों और भीड़-भाड़ के बीच, छोटे-छोटे सपनों को लेकर आई थी सुनीति ठाकुर। AI इंजीनियर बनने सपना पूरा हो चुका था। जॉब मिल गई थी, और अब उसे बस अपने पैरों पर खड़ा होना था।सुनीति कमरे में सामान रखते हुए।सुनीति (सोचते हुए) -“ये रूम अच्छा है… छोटा है पर आराम से रह सकती हूँ। अब मेरी असली ज़िन्दगी की शुरुआत होगी।”तीन दिन तक सब सामान्य रहा।रात का समय – सुनीति लैपटॉप पर काम कर रही है)हवा हल्के से परदे हिलाती है।सुनीति (धीरे से) बोली -“ये खिड़की तो मैंने बंद की थी… हवा अंदर कैसे?”वो खिड़की चेक ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 2
दिल्ली की बड़ी सड़कों और भीड़-भाड़ के बीच, छोटे-छोटे सपनों को लेकर आई थी सुनीति ठाकुर। AI इंजीनियर बनने सपना पूरा हो चुका था। जॉब मिल गई थी, और अब उसे बस अपने पैरों पर खड़ा होना था।सुनीति कमरे में सामान रखते हुए।सुनीति (सोचते हुए) -“ये रूम अच्छा है… छोटा है पर आराम से रह सकती हूँ। अब मेरी असली ज़िन्दगी की शुरुआत होगी।”तीन दिन तक सब सामान्य रहा।रात का समय – सुनीति लैपटॉप पर काम कर रही है)हवा हल्के से परदे हिलाती है।सुनीति (धीरे से) बोली -“ये खिड़की तो मैंने बंद की थी… हवा अंदर कैसे?”वो खिड़की चेक ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 3
सुनीति ऑफिस से वापस आती है। उसके चेहरे पर थकान और उदासी साफ झलक रही है।आज ऑफिस में बॉस उसे डाँट दिया था। पहली बार उसे अपने आप पर भरोसा टूटा हुआ लगा।कमरे में आते ही वो ज़मीन पर बैठ जाती है और बच्चों की तरह रोने लगती है।सुनीति (रोते हुए) बोली -“मैं इतनी कोशिश करती हूँ… फिर भी सब मुझसे नाराज़ क्यों रहते हैं? क्या मैं सच में इतनी कमज़ोर हूँ?”अचानक उसके सामने टेबल पर एक सफेद रूमाल रखा हुआ दिखता है, जो कुछ देर पहले वहाँ नहीं था।सुनेति (चौंककर, धीरे से) बोली -“ये… ये रूमाल कहाँ से ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 4
सुनीति अलमारी से कौशिक का बैग निकालती है। उसमें से तस्वीरें, मार्कशीट और डायरी टेबल पर रख देती है। ध्यान से सब देखता है।सुनीति (गंभीर होकर) बोली -ये देखो तरुण… ये सब कौशिक का है।इतना होनहार, इतना अच्छा इंसान… अचानक कैसे ग़ायब हो गया?ये राज़ मुझे जानना है।तरुण (सोचते हुए) बोला -सुनीति, मेरी मानो तो तुम ये कमरा छोड़ दो।यहाँ रहना तुम्हारे लिए खतरनाक हो सकता है।नया फ्लैट ले लो, शांति से रहो।”तरुण अभी बोल ही रहा होता है कि अचानक उसकी पीठ पर ज़ोरदार तमाचा पड़ता है। वो चिल्लाकर उछल पड़ता है।तरुण (चीखकर) बोला -आह्ह! किसने… किसने मारा?कमरे ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 5
सुनीति अपने घर में टहल रही है। बेचैन नज़रें, कांपते हाथ। अचानक दरवाज़े पर घंटी बजती है।सुनीति (दरवाज़ा खोलते बोली -तरुण… अंदर आओ।तरुण अंदर आता है। सुनीति उसे बैठने का इशारा करती है।सुनीति (गंभीर आवाज़ में) बोली -तरुण… अब मैं तुमसे वो बात कहने जा रही हूँ, जो शायद कोई विश्वास नहीं करेगा।ये कमरा… ये जगह… ये सिर्फ़ मेरी नहीं है। यहाँ कोई और भी है… कौशिक ठाकुर।तरुण थोड़ी देर चुप रहता है, फिर हंसकर कहता है।तरुण बोला -मतलब वही लड़का जो गायब हो गया था?सुनीति (तेज़ी से सिर हिलाकर) बोली -हाँ… वो यहीं है। अदृश्य। मैंने उसे महसूस ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 6
टीम धीरे-धीरे टूटी दीवार के रास्ते लैब के अंदर घुसती है। अँधेरा है, लेकिन मशीनों की धीमी-धीमी आवाज़ गूँज है। चारों तरफ़ तार, केमिकल के बड़े-बड़े कंटेनर और लाल-नीली लाइट्स।राकेश (फुसफुसाकर) बोला -“यही है वो जगह… जहाँ खतरनाक प्रयोग होते हैं।”(अचानक दीवार पर लगी स्क्रीन अपने आप जल उठती है। उस पर अजीब कोड्स और फॉर्मूलों की झलक आती है। सुनेति ठिठक जाती है।)सुनीति बोली -“ये वही फॉर्मूला है… जो डायरी में लिखा था।”(गुंजन कंप्यूटर हैक करने लगती है। तभी काँच के बड़े चैंबर में हल्की रोशनी होती है। सब चौंककर देखते हैं। चैंबर के अंदर कुछ इंसानी सिलुएट्स ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 7
(रात के 2:34 बजे। कमरे में हल्की पीली रोशनी।(सुनीति चश्मा लगाए खड़ी है। कौशिक उसके सामने बैठा है — बार पूरी तरह साफ़ दिखाई देता हुआ।)(दोनों चुप हैं।)कभी-कभी जब कोई सपना सच होता है…तो इंसान डरता है कि कहीं आँख झपकते ही टूट न जाए।सुनीति (धीरे से) बोली -“तुम… ऐसे सामने बैठकरमुझसे बात करोगे…मैंने कभी सोचा भी नहीं था।”कौशिक (मुस्कुराकर)। बोला -“मैं भी नहीं।मैं तो भूल ही चुका था किकोई मुझे इस तरह देख पाएगा।”(सुनीति उसे ध्यान से देखती है।)सुनीति बोली -“तुम थके हुए लगते हो।”कौशिक (सच्चाई से) बोला -“क्योंकि दो साल से…मैं बस मौजूद था,पर ज़िंदा नहीं।”(सुनीति पानी ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 8
(सुबह की धूप कमरे में आ रही है।)(कौशिक आईने के सामने खड़ा है — पूरी तरह साफ़ दिख रहा (मुस्कुराकर) बोला -“मैं सच में ठीक हूँ, सुनीति।”(सुनीति राहत की साँस लेती है।)सुनीति बोली -“आज पहली बार डर नहीं लग रहा।”(वो दोनों साथ नाश्ता करते हैं — बिल्कुल आम कपल की तरह।)(ड्रॉइंग रूम – पूरा परिवार मौजूद है।)राकेश बोला -“अब कोई परछाईं नहीं, कोई अदृश्यपन नहीं।सब कुछ नॉर्मल है।”राधिका (हँसते हुए) बोली -“लगता है किस्मत ने आखिरकार चैन दे दिया।”(कौशिक सबको देखकर सिर झुकाता है — कृतज्ञता में।)(ऑफिस – कौशिक लैपटॉप पर काम कर रहा है।)कौशिक फिर से ज़िंदगी की ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 9
(सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही है।)(सुनीति की आँख खुलती है।)(वो हाथ बढ़ाकर बिस्तर के दूसरे हिस्से टटोलती है…खाली।)सुनीति (घबराकर) बोली -“कौशिक जी…?”(वो उठकर चारों तरफ़ देखती है।)कमरा वैसा ही सजा हुआ…पर पति ग़ायब।(सुनीति की साँसें तेज़ हो जाती हैं।)सुनीति (टूटती आवाज़ में) बोली -“नहीं… फिर से नहीं…।”(उसकी नज़र टेबल पर रखे चश्मे पर पड़ती है।)(हाथ काँपते हैं।)(सुनीति जल्दी से चश्मा पहन लेती है।)(एक पल सन्नाटा…)(फिर…)(बिस्तर पर कौशिक दिखाई देता है — चैन से सोता हुआ।)सुनीति (आँखों में आँसू लेते हुए) बोली -“यहीं हो आप…”(वो गहरी साँस लेती है।)(सुनीति धीरे-धीरे बिस्तर पर बैठती है।)(वो कौशिक के पास ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 10
(सुबह।)(कौशिक आईने के सामने खड़ा है। आँखों पर चश्मा।)कौशिक (थोड़ा असहज होकर) बोला -सुनीति… सच कहूँ तोमुझे इसमें बिल्कुल नहीं लग रहा।सुनीति (समझाते हुए) बोली -आज पहली बार ऑफिस जा रहे हैं शादी के बाद।थोड़ा एडजस्ट कर लीजिए… प्लीज़।(कौशिक गहरी साँस लेकर हामी भर देता है।)(ऑफिस के केबिन में कौशिक कंप्यूटर पर काम कर रहा है।)(स्क्रीन चमक रही है।)चश्मे से कौशिक सबकुछ साफ़ दिखाई दे रहा था…पर उसकी अपनी दुनिया धुंधली हो रही थी।(वो सिर पकड़ लेता है।)कौशिक (कराहते हुए) बोला -सिर फट रहा है…(वो चश्मा उतार देता है।)(कुर्सी… खाली।)(केबिन का दरवाज़ा खुलता है।)राघव (अंदर आते हुए) बोला -Good ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 11
(सुबह का वक्त।)(सुनीति रसोई में खड़ी है। चाय उबल रही है…वो ध्यान में नहीं।)(चाय उफनकर गिर जाती है।)सुनीति (खुद चिड़कर) बोली -“ध्यान भी नहीं रहता अब…”(वो गैस बंद कर देती है।)दिन पर दिन सुनीति का सब्र कम होता जा रहा था।(कमरे में कौशिक बैठा है। चश्मा लगाए हुए।)कौशिक बोला -“सुनीति, आज दवा—”सुनीति (तेज़ आवाज़ में) बोली -“बाद में!अभी मेरे पास टाइम नहीं है।”(कौशिक चुप हो जाता है।)(सुनीति को एहसास होता है पर वो कुछ नहीं कहती।)(रात।)(कौशिक सो चुका है।)(सुनीति बाथरूम में बंद।)(नल खोल देती है ताकि आवाज़ बाहर न जाए।)(वो दीवार से टिककर बैठ जाती है।)सुनीति (सिसकते हुए, धीमी ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 12
(कमरे में हल्की नीली रोशनी। खिड़की के बाहर भोर होने को है।)(सुनीति कौशिक की बाहों में है। उसकी साँसें शांत हैं, लेकिन आँखें खुली हुई।)कुछ आँसू दूसरों के लिए होते हैं… और कुछ आँसू खुद के लिए रोने का साहस देते हैं।(कौशिक की पकड़ ढीली पड़ती है। वो थककर सो चुका है।)(सुनीति धीरे से खुद को अलग करती है।)(वो खिड़की के पास जाकर बैठ जाती है। सामने उगता सूरज, लेकिन उसकी आँखों में अंधेरा।)सुनीति (अपने आप से, फुसफुसाकर) बोली -“मैं मजबूत बनने की कोशिश मे खुद को कब भूल गई… पता ही नहीं चला।”(उसकी आँखें भर आती हैं, लेकिन ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 13
(सुबह का समय। घर में सन्नाटा। कौशिक ऑफिस के लिए निकल चुका है—चश्मा लगाए हुए।)(सुनीति दरवाज़े के पास खड़ी जाते हुए देखती है। आँखों में डर, मन में बेबसी।)जब हर रास्ता बंद हो जाए… तब इंसान भगवान के दरवाज़े पर पहुँचता है।(सुनीति मंदिर के बाहर खड़ी है। नंगे पाँव, हाथ में चुनरी।)(घंटी की आवाज़ गूँजती है।)(वो धीरे-धीरे अंदर जाती है और एक कोने में बैठ जाती है।)(मंदिर में शांति है। धूप की खुशबू। आरती की धीमी आवाज़।)(सुनीति दोनों हाथ जोड़ती है… पर शब्द नहीं निकलते।)(कुछ पल बाद—)सुनीति (सिसकते हुए) बोली -“भगवान…मैंने आपसे कभी कुछ नहीं माँगा…”(उसकी आवाज़ काँपती है।)सुनीति ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 14
(रात। कमरा शांत है। टेबल पर ग्रंथ खुला है, पास ही कौशिक का चश्मा।)(सुनीति खिड़की के पास खड़ी है। पर डर नहीं… एक अडिग फैसला।)जब इंसान तय कर ले कि वो क्या खोने को तैयार है—तब डर पीछे छूट जाता है।(सुनीति पलटती है। कौशिक पास खड़ा है, घबराया हुआ।)कौशिक बोला -तुम कुछ छुपा रही हो…मैं महसूस कर सकता हूँ।सुनीति (धीरे, पर मज़बूती से) बोली -मैं सच छुपा रही हूँताकि आप बच सकें।कौशिक (आवाज़ टूटती हुई) बोला -मैंने मना किया था…सुनीति (हाथ पकड़कर) बोली -और मैंने शादी में वादा किया था—हर हाल में आपके साथ रहने का।(कौशिक कुछ नहीं कह ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 15
(कमरा वही है… पर अब खाली नहीं—बल्कि दिखाई न देने से भरा हुआ।)(ना सुनीति दिख रही है, ना कौशिक। दो साँसों की आवाज़ें।)अब वो अकेली नहीं थी…अब वो दोनों हीदुनिया की नज़रों से ग़ायब हो चुके थे।सुनीति (टूटी हुई आवाज़ में) बोली -“मुझसे गलती हो गई कौशिक…मैंने सोचा था मेरे अदृश्य होने से आप बच जाएँगे…”(वो अपने हाथ देखती है—कुछ भी नहीं।)सुनीति बोली -“पर मुझे ये नहीं पता था कि जिस दवा को मैंने पिया…उसका कोई antidote ही नहीं है…”(कौशिक उसे देख रहा है। अदृश्य आँखों से अदृश्य आँसू। वो दोनों अब एक दूसरे को बिना चश्मे के भी ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 16
(दोपहर। हवेली के बाहर कुछ लोग काग़ज़ों पर साइन कर रहे हैं।सुनीति और कौशिक पास खड़े हैं—अदृश्य।)एक सेठ ने हवेली को गैरकानूनी तरीके से बेच दिया था।उन्हें पता था… पर फर्क नहीं पड़ा।सुनीति (शांत स्वर में) बोली -“अब ये घर भी हमारा नहीं रहा…”कौशिक (मुस्कराकर) बोला -“हमारी बॉडी अब किसी जगह से एडजेस्ट होती ही नहीं।”ना दीवारें उनकी थीं, ना छत… बस साथ अब भी उनका था।(सुनीति खिड़की के पास खड़ी है।)सुनीति बोली -“पर मैं देखना चाहती हूँ…कौन आएगा इस घर में।”कौशिक बोला -“हाँ…शायद कोई कहानी फिर से शुरू हो।”(कुछ दिन बाद। एक गाड़ी हवेली के सामने रुकती है। ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 17
(रात का समय। हवेली के बाहर सन्नाटा। अंदर बच्चों के कमरे में हल्की-सी रोशनी।)कुछ रातें नींद नहीं लातीं… सुकून हैं।और इस हवेली में हर रात अब किसी के आने का वक़्त तय था।(सुनीति और कौशिक धीरे-धीरे कमरे में आते हैं। उनके कदमों की कोई आवाज़ नहीं।)सुनीति(मुस्कुराकर) बोली -“देखिए…आज भी कितनी शांति से सो रहे हैं।”कौशिक बोला -“शायद इन्हें महसूस होता है कि कोई है… जो इन्हें छोड़कर नहीं जाएगा।”(सुनीति आरुषि के सिरहाने बैठती है। हल्के से उसके बालों में उँगलियाँ फेरती है।)वो हाथ दिखते नहीं थे…पर उनकी गर्माहट बिल्कुल माँ जैसी थी।(आरुषि नींद में करवट बदलती है, होंठों पर ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 18
(शाम का समय। राधिका किचन में खड़ी है। चूल्हे पर दूध उबल रहा है।)(उसका ध्यान बार-बार भटक रहा है। में अजीब-सी घबराहट।)माँ का दिल कभी-कभी बिना देखे भी सब समझ लेता है।(अचानक बच्चों के कमरे से आवाज़ आती है।)आरुषि (हँसते हुए) बोली -“अरे अंकल! ऐसे मत खड़े रहो ना!”(राधिका का हाथ रुक जाता है।)राधिका (खुद से) बोली -“अंकल? घर में तो कोई आया नहीं…”(राधिका दबे पाँव बच्चों के कमरे की तरफ बढ़ती है।)(दरवाज़ा आधा खुला है।)(वो अंदर झाँकती है।)(कमरे में आरुषि और आरव हैं।)(आरुषि ऐसे देख रही है जैसे किसी से बात कर रही हो।)आरुषि बोली -“आंटी तो बहुत ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 19
(हवन कुंड के सामने बैठे पंडित जी अचानक मौन हो जाते हैं।मंत्र रुक चुके हैं।।उनकी आँखें आग को नहीं…किसी दृश्य को देख रही हैं।)ये वही पंडित जी थे… जो इस घर में आज पहली बार नहीं आए थे।ये घर…ये नाम…ये रहस्य…सब उन्हें पहले से पता था।(पंडित जी की आँखों में बीता हुआ समय उतरता है।)पंडित जी (मन में) बोले -“कौशिक…विज्ञान का वो पागल लड़का…जो अदृश्य हो गया था।”(फ्लैशबैक शुरू होता है।)(शाम का समय। मंदिर में दीपक जल रहे हैं। घंटी की आवाज़।)(सुनीति मंदिर में बैठी है।उसके हाथ में एक पुरानी मोटी किताब है।)पंडित जी (तभी) बोले“बेटी…ये किताब साधारण नहीं ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 20
(रात का सन्नाटा। घड़ी की टिक-टिक साफ सुनाई दे रही है।कमरे में हल्की नीली रोशनी।)(राधिका की नींद अचानक टूटती (मन में) बोली -“आज… कुछ अजीब सा लग रहा है…”(वो धीरे से उठती है। बच्चों के कमरे की ओर जाती है।)(आरुषि और आरव गहरी नींद में सो रहे हैं। उनके चेहरे पर अजीब सी शांति है।)राधिका (धीमे स्वर में) बोली -“अजीब है…ये बच्चे हर रात इतने सुकून से कैसे सो जाते हैं…”(तभी उसकी नज़र टेबल पर रखे चश्मे पर पड़ती है। आरुषि का चश्मा।)(राधिका कुछ पल हिचकिचाती है।)राधिका (खुद से) बोली -“बस एक बार…देख ही लेती हूँ।”(राधिका चश्मा पहनती है। ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 21
(घर में सन्नाटा है। दीवार घड़ी की टिक-टिक साफ़ सुनाई दे रही है।)(Mr. राणा सोफ़े पर बैठे हैं। नींद आ रही। हाथ में वही चश्मा है जिसे राधिका ने चुपके से रख दिया था।)Mr. राणा (खुद से) बोले -“राधिका कुछ दिनों से बदली-बदली सी है… बच्चे भी… जैसे किसी से बात करते रहते हों।”(वो चश्मे को घूरते हैं… फिर धीरे से पहन लेते हैं।)(जैसे ही चश्मा आँखों पर चढ़ता है— कमरे का सन्नाटा टूटता है।)(खिड़की के पास एक आदमी खड़ा है। शांत, गंभीर, आँखों में थका हुआ सुकून।)Mr. राणा (हड़बड़ाकर खड़े होते हुए) बोले -“क…कौन है वहाँ?!”(कौशिक मुड़ता है। ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 22
(शाम का समय। हवेली के बाहर घंटी बजती है।)(दरवाज़ा खुलता है। पंडित जी हाथ में पुरानी, हल्की फटी हुई लिए खड़े हैं। चेहरे पर गंभीरता।)पंडित जी बोले -“राधिका बहू…आज जो लाया हूँ,वो इस घर की किस्मत बदल सकता है।”(राधिका और Mr. राणा चौंक जाते हैं।)(पंडित जी डायरी टेबल पर रखते हैं। कवर पर हल्के अक्षर— Suniti Thakur.)राधिका (धीमे स्वर में) बोली -“ये… सुनीति की डायरी?”पंडित जी (सिर हिलाते हुए) बोले -“हाँ।ये वही डायरी है जो वो मंदिर से उठाकर ले जा रही थीउस दिन…जब वो दृश्य और अदृश्य के बीच की किताब ले गई थी।”(कमरे में सन्नाटा।)(सुनीति और कौशिक ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 23
(मशीन का भारी दरवाज़ा धड़ाम से बंद हो जाता है। बाहर की आवाज़ें कट जाती हैं।)(अंदर—पूरा अंधेरा। कोई स्क्रीन कोई बटन नहीं। सिर्फ़ साँसों की आवाज़।)ये कोई लैब नहीं थी…ये तो जैसे दृश्य और अदृश्य के बीच का ख़ालीपन था।(सुनीति अंधेरे में हाथ बढ़ाती है। उंगलियाँ काँप रही हैं।)सुनीति (धीरे से) बोली -“कौशिक जी…आप यहीं हो न?”(कौशिक तुरंत उसे अपनी ओर खींच लेता है।)कौशिक बोला -“मैं यहीं हूँ…और कहीं नहीं जाना।”(वो सुनीति को कसकर सीने से लगा लेता है।)(दोनों की धड़कनें एक-दूसरे में घुलने लगती हैं।)(अंधेरे में सिर्फ़ दिलों की आवाज़।)सुनीति (रोते हुए) बोली -“अगर ये आख़िरी पल हुए ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 24
(लैब में लाल बत्ती घूम रही है। अलार्म तेज़ हो चुका है—बीप—बीप—बीप—!)कंप्यूटर वॉइस —“️ WARNING…SYSTEM OVERLOAD…10… 9… 8…”(Mr. राणा उंगलियाँ काँप रही हैं।)Mr. राणा (चिल्लाकर) बोले -“अब पीछे हटने का वक्त नहीं है!”(राधिका बच्चों को सीने से लगाए खड़ी है।)राधिका (रोते हुए) बोली -“हे भगवान… इन्हें बचा लो…”(पंडित जी ज़मीन पर बैठकर आँखें बंद कर मंत्र पढ़ते हैं।)(अंदर दीवारें काँप रही हैं। रोशनी अब सफ़ेद से नीली हो रही है।)(सुनीति को तेज़ दर्द होता है।)सुनीति (कराहते हुए) बोली -“कौशिक…लग रहा है जैसे शरीर टूट रहा हो…”(कौशिक उसे कसकर पकड़ लेता है।)कौशिक (आँखों में आँसू लिए) बोला -“अगर ये आख़िरी ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 25
(सुबह का वक्त। कौशिक की हथेली में नए फ्लैट की चमचमाती चाबी है।)(वो चाबी को एक पल देखता है पुरानी ज़िंदगी को अलविदा कह रहा हो।)कौशिक (धीरे से) बोला -“चलो सुनीति…यहाँ से फिर शुरू करते हैं।”(सुनीति उसकी बाँह पकड़ लेती है।)सुनीति (मुस्कुराकर) बोली -“इस बार भागकर नहीं… ज़िंदगी की ओर चलते हुए।”(दरवाज़ा खुलता है।)(खुली बालकनी,साफ़ दीवारें,खाली कमरा पर उम्मीदों से भरा हुआ।)(सुनीति अंदर कदम रखती है। थोड़ा रुककर फर्श पर हाथ रखती है।)सुनीति बोली -“यह घर…डर से नहीं बना,सपनों से भरेगा।”(कौशिक हल्की हँसी के साथ कहता है।)कौशिक बोला -“और अब कोई नहीं कहेगा—इस घर में भूत रहता है।”(दोनों हँस ...और पढ़े
अदृश्य पीया - 26
(सुबह। सुनीति आईने के सामने खड़ी है। उसका चेहरा थोड़ा थका हुआ, पर आँखों में अजीब चमक।)सुनीति (खुद से) -“पता नहीं क्यों…आज दिल कुछ अलग ही महसूस कर रहा है।”(वो हल्की-सी चक्कर खाकर कुर्सी पकड़ लेती है।)(किचन से कौशिक दौड़कर आता है।)कौशिक (घबराकर) बोला -“सुनीति! क्या हुआ?तबियत ठीक नहीं है क्या?”सुनीति (धीमे से मुस्कुराकर) बोली -“नहीं…बस… कुछ अलग-सा लग रहा है।”(कौशिक उसका हाथ थाम लेता है। उसकी धड़कन तेज़ हो जाती है।)(क्लिनिक।दोनों पास-पास बैठे हैं।)(डॉक्टर रिपोर्ट देखती है, फिर मुस्कुरा देती है।)डॉक्टर बोली -“Congratulations…आप माँ बनने वाली हैं।”(सुनीति की आँखें भर आती हैं। कौशिक कुछ पल बोल ही नहीं ...और पढ़े