अपेक्षाओं का होना किसी भी संबंधी में, संबंध के लिए बीमारी होती हैं, बगैर अपेक्षाओं के कोई हमारी जरूरतों को हमारा संबंधी संबंध में पूरा करें तो ही, क्योंकि वो ही अपेक्षाएं पूरी होती हैं नहीं तो केवल आश्वासन रहता हैं अपेक्षाओं के पूरे होने का, जो अपेक्षाएं पहले से होती हैं उनके पूरे होते ही किसी दूसरे रूप में वो अपेक्षाएं वैसी की वैसी, उस संबंधी से जिससे पहले अपेक्षा थी और उसने उसे पूरी की, वो अपेक्षाएं, नए रूप में फिर आ जाती हैं, सोचो हमारी संबंध में कोई सी जरूरत हैं और हमें बिलकुल उम्मीद ही नहीं
सत्य मीमांसा - 1
अपेक्षाओं का होना किसी भी संबंधी में, संबंध के लिए बीमारी होती हैं, बगैर अपेक्षाओं के कोई हमारी जरूरतों हमारा संबंधी संबंध में पूरा करें तो ही, क्योंकि वो ही अपेक्षाएं पूरी होती हैं नहीं तो केवल आश्वासन रहता हैं अपेक्षाओं के पूरे होने का, जो अपेक्षाएं पहले से होती हैं उनके पूरे होते ही किसी दूसरे रूप में वो अपेक्षाएं वैसी की वैसी, उस संबंधी से जिससे पहले अपेक्षा थी और उसने उसे पूरी की, वो अपेक्षाएं, नए रूप में फिर आ जाती हैं, सोचो हमारी संबंध में कोई सी जरूरत हैं और हमें बिलकुल उम्मीद ही नहीं ...और पढ़े
सत्य मीमांसा - 2
Already Recognised, Too much Admired, no need for Admiration and Recognition, I know who am I, no one/ nobody, कभी था, न होऊंगा क्योंकि मैं नहीं हूँ but yes तत् त्वं असि you are that. जिनको अपने सामर्थ्य पर भरोसा नहीं होता, जो खुद को जानते पहचानते नहीं हैं वो मान्यता देते कि जगह मान्यता प्राप्त करना चाहते हैं, जो नालायक हैं वो ही मान्यता कि चाह रखेगा क्योंकि जिसके पास लाइकीयत होती हैं वो अपनी मान्यता भी दूसरों को दे देते हैं और कोई उनको माने न माने उनको फर्क नहीं पड़ता क्योंकि समर्थता तो स्वाभाविक हैं ...और पढ़े
सत्य मीमांसा - 2.5
जो हमारी उपस्थिति अनुभव हो रही हैं, वहीं तो सर्वशक्तिमान के प्रभाव की उपस्थिति का अनुभव हैं, उसकी उपस्थिति, उसके प्रभाव की उपस्थिति से ही महसूस कर सकते हैं अन्यथा उसका ओर छोर जानना तो संभव हैं पर पहचानना असंभव, हाँ हममें जितना सामर्थ्य बढ़ते जाता हैं हम उसकी उपस्थिति, उसके प्रभाव की उपस्थिति मतलब कि गुणवत्ता और मात्रा नाप सकते हैं मगर जिस अहम के आकार से उसे नापेंगे, जिस अहम के आकार में उसे नापेंगे, जितना अधिक नापना होगा, उतना ही बड़ा या स्पष्ट हमारे अहम का आकार होगा, बाहरी और आंतरिक इंद्रियों यानी ज्ञान के द्वारों ...और पढ़े
सत्य मीमांसा - 3
जो हमारी उपस्थिति अनुभव हो रही हैं, वहीं तो सर्वशक्तिमान के प्रभाव की उपस्थिति का अनुभव हैं, उसकी उपस्थिति, उसके प्रभाव की उपस्थिति से ही महसूस कर सकते हैं अन्यथा उसका ओर छोर जानना तो संभव हैं पर पहचानना असंभव, हाँ हममें जितना सामर्थ्य बढ़ते जाता हैं हम उसकी उपस्थिति, उसके प्रभाव की उपस्थिति मतलब कि गुणवत्ता और मात्रा नाप सकते हैं मगर जिस अहम के आकार से उसे नापेंगे, जिस अहम के आकार में उसे नापेंगे, जितना अधिक नापना होगा, उतना ही बड़ा या स्पष्ट हमारे अहम का आकार होगा, बाहरी और आंतरिक इंद्रियों यानी ज्ञान के द्वारों ...और पढ़े