वरिष्ठ पत्रकार ओंकारनाथ उपाध्याय को एक दिन अचानक यह अहसास हुआ कि अब सीरियस लोगों की कोई पूछ नहीं रही। अब सफल वही लोग हैं जो अगंभीर हैं। उन्होंने तय कर लिया कि अब वह अगंभीर बनेंगे। उन्होंने उसी दिन से इसकी प्रैक्टिस शुरू कर दी। उन्होंने अपनी चुप्पी तोड़ दी। अब वे बात-बात में हंसने लगे बिना मतलब ही। उन्हें लगा कि मुख्यधारा में अपनी जगह बनाने के लिए तीन ‘सी’ की जरूरत है- सिनेमा, क्रिकेट और कार। उनके मैनेजर और नई पीढ़ी के पत्रकार इन्हीं तीन चीजों की चर्चा में हर वक्त मशगूल रहते थे। अब उनकी सैलरी इतनी थी नहीं कि हर नई फिल्म देख आएं। घर में टीवी पर बच्चों का कब्जा था।