Shyamlal ka Akelapan

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क्या इंसान और होर्डिंग में कोई समानता हो सकती है? भले ही यह एक बेतुका सवाल लगे, पर श्यामलाल का मानना था कि आज हर आदमी एक होर्डिंग में बदलता जा रहा है, एक ऐसी विशाल रंगीन होर्डिंग, जिस पर किसी प्रॉडक्ट का विज्ञापन चमक रहा हो। आदमी ज्यों ही मुंह खोलता है कोई उत्पाद उसके मुंह से चीखने-चिल्लाने लगता है। श्यामलाल का अपार्टमेंट हो या दफ्तर, हर जगह ऐसे ही लोग उन्हें नजर आते थे। यहां तक कि बस और मेट्रो ट्रेन में भी होर्डिंगनुमा लोग मिल रहे थे। सड़क पर भी घड़ी दो घड़ी के लिए किसी से कोई संवाद होता तो वह भी प्रचार पर उतारू होने लगता।