अस्पताल के उस आईसीयू के बाहर की ठंडी हवा भी जैसे आग बरसा रही थी। डॉक्टर की एक-एक बात आयरा के पैरों तले ज़मीन खिसका रही थी। कबीर की हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी, और अब मशीनों की बीप की आवाज़ कमज़ोर पड़ती धड़कनों का गवाह बन रही थी। तभी डॉक्टर ने गंभीर चेहरे के साथ कहा, "देखिए, अब उन्हें अंदर रखना मुमकिन नहीं है, उनकी हालत बहुत नाज़ुक है... आपको बाहर जाना होगा।""नहीं, डॉक्टर साहब! मुझे उनके पास ही रहना है," आयरा की आँखों से सैलाब बह निकला। उसने कबीर की तरफ देखा। उस कमज़ोर और बेसुध जिस्म के