याज्ञवल्क्य उपनिषद --यह उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद से सम्बंधित है। यह शुक्ल यजुर्वेद की वाजसनेयी शाखा का उपनिषद है। यह 108 उपनिषदों की मुक्तिक-सूची में इसका क्रम 97 वां है। इसे 20 संन्यास उपनिषदों में गिना जाता है। इसमें कुल 32 श्लोक हैं, जो 4 अध्यायों में बंटे हैं।अध्याय 1-3 = संन्यास की विधि, शिखा-सूत्र त्याग, परमहंस के लक्षण। अध्याय 4 = 24 श्लोक, जिसमें समदर्शन, वैराग्य और क्रोध-त्याग का उपदेश है।शांति पाठसंस्कृत:ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥अर्थ: वह ब्रह्म पूर्ण है, यह जगत भी पूर्ण है। पूर्ण से पूर्ण निकलता है। पूर्ण का पूर्ण लेकर भी पूर्ण