(खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही है। दीवार पर टंगे दर्पण में करन अपनी परछाई देखता है।)करन (धीरे से) बोला – ये... ये मेरी आँखें लाल क्यों हैं...? (घबरा कर पीछे हटता है) (वो अपने चेहरे को बार-बार छूता है। उसके चेहरे पर डर और मासूमियत दोनों झलकते हैं।)सिमरन (पीछे से आती है, मुस्कुराकर )बोली – क्या हुआ करन? सुबह-सुबह आईने से डर गए क्या?करन (घबराया हुआ)बोला – नहीं... बस... मेरी आँखें ऐसी क्यों हैं, परी? बाकी सबकी तो काली होती हैं... तुम्हारी भी काली हैं...मेरी लाल क्यों?(सिमरन एक पल के लिए चुप हो जाती है। उसके चेहरे का रंग उड़