ज़िंदगी न जाने कैसी हो चली थी। माँ को मैं अब अक्सर ठाकुर साहब के साथ देखता था। दोनों के बीच धीरे-धीरे पहले जैसी दूरियाँ कम होने लगी थीं। माँ के चेहरे पर भी अब कुछ सुकून दिखाई देने लगा था। अपने पिता का चेहरा तो मुझे याद नहीं था, लेकिन नानी जैसे अक्सर कहा करती थीं कि वह जैसे भी थे, अच्छे ही रहे होंगे। शायद इसी वजह से बचपन से ही मेरे मन में अपने पिता को लेकर एक अलग-सी कल्पना रही थी। कभी-कभी सोचता था कि अगर वह आज ज़िंदा होते, तो क्या मेरी ज़िंदगी कुछ और