शेर के बाद का सन्नाटा27 जून 1839 की वह मनहूस शाम थी जब लाहौर के आसमान पर लालिमा नहीं, बल्कि शोक की काली घटा छाई थी पंजाब के शेर, महाराजा रणजीत सिंह ने अपनी आखिरी सांस ली और इसके साथ ही खालसा राज की दीवारें दरकने लगीं महाराजा की आखिरी इच्छा थी कि कोहिनूर को जगन्नाथ पुरी के मंदिर में दान कर दिया जाए, ताकि वह भारत की पवित्र मिट्टी में रहे पर दरबारियों के स्वार्थ और अंग्रेजों की गुप्त साजिशों ने उस महान आत्मा की अंतिम पुकार को अनसुना कर दिया जैसे ही महाराजा की चिता की आग ठंडी