एक दिन की देवियाँ

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बचपन के दिनों में एक बार एक साधु महाराज हमारे गाँव में आए थे। गाँव में साधु-संतों का आना कोई मामूली बात नहीं थी। उनके आते ही लोगों की श्रद्धा जैसे उमड़ पड़ती थी। उनके ठहरने, खाने-पीने और सेवा-सत्कार में कोई कमी न रह जाए, इसके लिए लोग एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते।महाराज कुछ दिनों तक गांव के एक घर में विशेष रूप से रुके । जिस घर में सबसे अधिक आदर-सत्कार मिला था, शायद वो घर उन्हें कुछ अधिक ही प्रिय हो गया था, वो घर मेरी दोस्त बुल्ली का था,महाराज के उठने, बैठने, सोने, नहाने और