अब तकआखिर तुम मान ही गई, आ गई अपनी औकात पर, तुम जैसी बाजारू लड़कियां अपना असली रंग जल्दी दिखा देती हो। शरीफ बनने का फिर चाहे कितना ही नाटक क्यों ना करती हो तुम।" उसे आदमी के लहजे में नफरत और कड़वाहट दोनों झलक रही थी। फ़ना ने फोन को कसकर पकड़ लिया और धीमी और रूंधी आवाज़ में बोली, " सर." आगे के शब्द नहीं बोल पा रही थी, फ़ना।"सर सर. क्या हम मिल सकते हैं?" "हम्म. Okk i'm coming बार के सामने मेरा वेट करो."अब आगे-फ़ना अपनी चोल से बाहर जाने के लिए निकल रही थी। निशु