बनारस की ख़ामोशी - 4

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मैं बनारस की हल चल से दूर उसकी खामोशी में जीने लगीं। कुछ भी पहले जैसा नहीं था। रोज़ चलने वाली हवाओं ने भी, अपना रास्ता बदल दिया था।अस्सी घाट पर अभी भी बहुत भीड़ रहतीं थी लेकिन उस भीड़ में भी ख़ामोशी थी। अनकहे शब्द थे।चायवाले की दुकान पर नया बोर्ड लग चुका था। वही गंगा है, पर किनारे पर चेहरों की भीड़ बदल चुकी थी।अब लगता था जैसे गंगा ने भी मुंह फेर लिया हो। दीपक के साथ जिस बनारस में मैंने प्रेम को महसूस किया था, जीना सीखा था। वो बनारस काट खाने को दौड़ता है।और समय ने ऐसी