पत्थर तले

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                  उस बृहस्पतिवार के बाद से मैं अब चौकन्नी रहने लगी हूं। अपने बक्से के प्रति।अपनी आलमारी के प्रति।अपने खाने के प्रति।अपने सोने के प्रति।                बेटे से कह कर अपना बक्सा मैं ने यहीं चारपाई के नीचे रखवा लिया है। रात बढ़ते ही मैं अपनी पहिएदार कुर्सी पर आ बैठती हूं। जब तक सब सो नहीं जाते मैं वहीं बैठी रहती हूं। रात में भी ज़रा आहट होती है तो मैं बेटे को पुकारने लगती हूं, “राकेश…राकेश…देखो कौन है?”