धड़कने दिल की - 4

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लाइब्रेरी के भारी शीशम के दरवाजों पर लोहे की सांकल गिरने की गूंज सन्नाटे में दूर तक तैर गई। बूढ़े लाइब्रेरियन की चाबियों का गुच्छा खनखनाया, और फिर सब कुछ एकदम शांत हो गया। गहरा, जानलेवा सन्नाटा।धूल भरी खिड़कियों से छनकर आती नारंगी धूप अब धीरे-धीरे सुरमई नीले अंधेरे में बदल रही थी। आर्काइव सेक्शन के उस संकरे कोने में, जहां कबीर कुछ पल पहले एक भूखे भेड़िए की तरह सूंघता हुआ खड़ा था, अब सिर्फ दो लोगों की भारी सांसों की हलचल बची थी।सिया ने जमीन पर बैठे-बैठे ही दोनों हाथों से अपना चेहरा ढांप रखा था। उसकी चूड़ियों