काल-दोष

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                सर्द दिसंबर की उस तेरहवीं तारीख को विलंब के कारण हिमगिरि एक्सप्रेस पठानकोट से लखनऊ रात में नौ पैंतीस पर पहुंची।                लखनऊ में हो रही नंदिता की बेटी की शादी पर मैं अकेली गई थी। संयोग से उन दिनों मेरे पति विदेश में थे, मेरी विवाहिता बेटी अपनी गर्भावस्था के आठवें महीने में थी और डाक्टरी कर रहा मेरा बेटा अपनी पढ़ाई में व्यस्त था।                 “क्या आप सुधा आंटी हैं? नंदिता आंटी की स्कूल की सहपाठिन?”