मंगरू ने बैठे-बैठे सोचा कि घर के लोगों के सुख-चैन की पूर्ति करना ही नियती है, क्या यही जीवन है। अगर यही जीवन है तो कैसा यह जीवन है। अपनी पसंद का कुछ कर नहीं सकता, कुछ खरीद नहीं सकता और तो और ठेले पर जाकर कूछ अच्छा खा भी नहीं सकता। तंग आया ऐसे जीवन से।मंगरू ने इस बात को बड़ी गहराई से सोचा तो उसका ध्यान अपने गहरे मित्र प्रदीप पर गया। प्रदीप की स्थिती, मंगरू की स्थिती की तरह बंदीशों भरी नहीं थी। ऐसा मंगरू इस लिए सोच पर रहा था क्योंकि प्रदीप अपनी पत्नी और बच्चों