आज्ञा

  प्रताप ने कुछ देर रूक कर कुछ गहरा सोचा और आगे बढ़ गया, धड़कन सामान्य हो चली थी और पसीने की बुंदे उसके रूमाल में समा चुकी थीं लेकिन कुछ सोच तो वह अब भी रहा था। प्रताप के ललाट के ऊपर उभरी लकीरें अब भी सामान्य नहीं हो पायी थी। वह देख तो शुन्य में रहा था। गाड़ी की सांय-सांय और पों-पों की आवाज भी उसका मन नहीं भटका पा रही थी।घर से निकलते वक्त प्रताप ने अपनी जेब में भुने हुए कुछ चने रखे थे, जो एक एक करके मुंह में डालता और इतना चबाता कि जैसे