अदिति किचन में जल्दी-जल्दी हाथ चला रही थी। दीवार घड़ी में एक बज रहा था। डेढ़ बजे अर्णव की छुट्टी होनी थी।बाहर सुबह से झिम-झिम बारिश हो रही थी, जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। काले बादलों ने दिन को ही शाम बना दिया था। अदिति ने चाय का कप वहीं छोड़ा, बालों का जुड़ा बनाया, छतरी उठाई और फ्लैट को लॉक करके सीढ़ियों से लगभग भागते हुए नीचे उतर गई। भूख लग रही थी, पर भूख से बड़ी थी बेटे की चिंता।सड़कें लबालब भरी थीं। शकरपुर की सड़क तो जैसे नदी बन गई थी। वह सड़क