भावनोपनिषद

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भावनोपनिषद भावनोपनिषद् अथवा श्रीचक्रोपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध शाक्त उपनिषद् के रूप में उपलब्ध है।॥ भावनोपनिषद् ॥मंगलाचरणस्वाविद्यापदतत्कार्यं श्रीचक्रोपरि भासुरम् ।बिन्दुरूपशिवाकारं रामचन्द्रपदं भजे ॥अर्थ:जो परम तत्त्व अपनी अविद्या और उसके कार्यरूप संसार से परे, श्रीचक्र के ऊपर प्रकाशित है और बिन्दुरूप शिवस्वरूप है, उस परम रामचन्द्र पद का मैं भजन करता हूँ।शान्तिपाठॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा ।भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।व्यशेम देवहितं यदायुः ।स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।स्वस्ति नस्तार्क्ष्योऽरिष्टनेमिः ।स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे देवताओं! हम अपने कानों से कल्याणकारी वचन सुनें। हे पूजनीय देवों! हम अपनी आँखों से कल्याणकारी दृश्य देखें। स्वस्थ और दृढ़ अंगों से