(सूरज की हल्की किरणें कमरे में प्रवेश कर रही हैं। सीया अभी भी हल्की थकी हुई है। कबीर उसे सहारा देकर कार में बैठाता है।)कबीर (धीमे स्वर में, खुद से) बोला - "बस, आज डॉक्टर से पता चल जाएगा… सब ठीक हो जाएगा… मुझे यकीन है।"(सीया धीरे-धीरे सामने की सीट पर बैठती है, सिर झुका कर। वो अभी भी उल्टियाँ और सिरदर्द महसूस कर रही है।)सीया (कमज़ोर आवाज़ में) बोली - "कबीर जी… मुझे डर लग रहा है… क्या मैं ठीक हो जाऊँगी?"(कबीर बस उसका हाथ पकड़ता है, कुछ नहीं बोलता। उसकी आँखों में चिंता है, पर शब्द नहीं निकलते।)(सड़क पर कार