अक्टूबर का महीना था। सुबह-शाम की हवा में हल्की ठंडक घुलने लगी थी। सूरज अभी-अभी क्षितिज के पार से झांका था और उसकी सुनहरी किरणें नदी के शांत जल पर तैर रही थीं।नदी के किनारे एक पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर पंडित रामशरण बैठे थे। माथे पर चंदन का तिलक, चेहरे पर तेजस्वी आभा। वे अभी-अभी सूर्य को अर्घ्य देकर लौटे थे। उन्होंने अपनी पोटली से शालिग्राम के काले, चमकीले पत्थर को बड़े यत्न से निकाला, नदी के जल से उन्हें स्नान कराया और फिर चबूतरे पर एक साफ कपड़े पर विराजमान किया। उन्होंने आंखें बंद कीं, कुछ मंत्र