योगकुण्डलिनी उपनिषद

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योगकुण्डलिनी उपनिषद--योगकुण्डलिनी उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद से सम्बद्ध योग-उपनिषद् है। परम्परागत पाठ में इसके 3 अध्याय और लगभग 171 मंत्र/श्लोक माने जाते हैं। इसमें प्राण, चित्त, मिताहार, आसन, प्राणायाम, कुण्डलिनी, नाड़ी, बन्ध, खेचरी विद्या और अन्ततः आत्म-ब्रह्मज्ञान का विवेचन है।मंगलाचरणयोगकुण्डल्युपनिषद्योगसिद्धिहृदासनम् ।निर्विशेषब्रह्मतत्त्वं स्वमात्रमिति चिन्तये ॥अर्थ:योगकुण्डलिनी उपनिषद् जिस योगसिद्धि के हृदय-आसन का वर्णन करती है, उस भेदरहित ब्रह्मतत्त्व को अपने ही स्वरूप के रूप में मैं चिन्तन करता हूँ।शान्ति-मन्त्रॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥अर्थ:हे परमात्मन्! हम दोनों की रक्षा करें, हम दोनों का पालन करें, हम दोनों मिलकर सामर्थ्यपूर्वक अध्ययन और साधना