टके कोस

  • 336
  • 105

                  “मलकिन आप को उधर बुला रही हैं,” किशोरीलाल मेरे कमरे में आन खड़ा हुआ।                  “रुक जाओ,” मैं खीझा। अपने नए सहपाठी,कुणाल,के साथ उस समय मैं स्क्रैबल खेल रहा था।                “रुक कैसे जांए?” किशोरीलाल को मेरे पिता ने सिर पर चढ़ा रखा था और वह जब- तब मां और मुझ से बदतमीज़ी पर उतर आया करता, “उधर रसोई में हमें सैंकड़ों काम नहीं हैं क्या?”                  “इधर आओ,” मुझे देखते