बनने से मिटने तक जीवन का मूल क्या है? कुछ बनने में—या हर क्षण मिटकर फिर बनने में? प्रकृति रोज मिटती है और रोज नई बनती है।पेड़ पुराने पत्ते छोड़ता है।नदी हर क्षण बदलती है।शरीर हर क्षण बदल रहा है।अस्तित्व तुम्हें हर क्षण मिटाता है और हर क्षण नया करता है। लेकिन मनुष्य क्या करता है? दुनिया उसे सिखाती है—मजबूत बनो। धर्म कहता है—धार्मिक बनो।सत्ता कहती है—अधिकारी बनो।धन कहता है—धनवान बनो।त्याग कहता है—महात्यागी बनो।कथा कहता है—कथावाचक बनो।राजनीति कहती है—नेता बनो। और मनुष्य हर जगह एक नया “मैं” बना लेता है। मैं धनवान हूँ।मैं धार्मिक हूँ।मैं त्यागी हूँ।मैं ज्ञानी हूँ।मैं