घुँघरू - 8

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घुँघरू के प्रति अपने असीम अनुराग को मैंने भक्ति के रूप में बदल दिया था और अपनी देवी को कीचड़ में धॅंसा हुआ छोड़ जाना मेरे वश की बात नहीं थी। उस देवी के समस्त दुखों का मूल अनन्त देव है, जो इस साम्राज्य का राजा है तो क्या उसे उसके निकृष्ट अनाचार का दंड न मिलेगा .... अवश्य मिलेगा। मैंने घुँघरू से अपने साथ राज - भवन चलने का आग्रह किया। उस समय वह एक शिला पर सिर झुकाये बैठी थी, उन्हें देख कर ही समझ आ रहा था कि उनके चित्त में भयंकर हाहाकार था। मेरी बात सुन