पूर्णिमा का नशा

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वो पूर्णिमा की रात थी। चाँद कुछ ज़्यादा ही पास लग रहा था। आसमान भी बिल्कुल साफ़ था—जैसे किसी ने उसको धोकर रख दिया हो। मैं बालकनी में बैठा था न जाने कितनी देर से। उसकी "हाँ" और "ना" के बीच अटका हुआ।उँगलियों के बीच सुलगता धुआँ, धीरे-धीरे हवा में घुल चुका था।एक तरफ नशा था— जो रगों में चढ़ कर, हर सोच को नरम कर रहा था। दूसरी तरफ वो थी—मेरे इतने करीब कि दूरी का एहसास और तेज़ हो रहा था।मुझे लगा, वो कुछ कहने वाली है। पर वो एक पल के लिए रुकी... जैसे कुछ सोच रही