सच

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  सच सच जानना था, सो चुपचाप हो गया। पता है, चुप होकर किसी के अन्दर से सच निकालने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। दरअसल ऐसी आग लगा दी थी, साँप-छुछुंदर वाला हाल हो गया था, न निगलते ही बने और न उगलते बने। अंततः उसको उगलना ही पड़ेगा। अपने मन की हलचल को अब तो वो छुपा ही नहीं सकता है। ऐसा ही प्रतीत हो रहा था विवके को। उसको लग रहा था कि आज मैंने अपने नाम को सार्थक कर लिया है। गोपाल से अब सच उगलवाकर ही छोड़ुंगा। गोपाल तो बिल्कूल हक्का-बक्का था, उसको