मेहनत

  • 796
  • 207

  घर वापसी का तो मन बना ही लिया था। अब तो जाना लगभग तय ही था। काम भी नहीं और रूपया भी खत्म।बिना रूपया का तो एक दिन भी गुजारा करना संभव है। यह बात तो कई लोगों ने समझायी थी।पिता ने भी कहा था ’’ थोड़े से पैसों का क्या मुल्य, चार-पाँच दिन में ही खत्म हो जाएंगे। ’’माँ ने आँख में आंसू भर कर कहा था ’’ मत जा बेटा, यहीं तो इतना सारा काम है। ’’मगर किसी की भी न सुनते हुए श्रवण शहर चला आया। जितना सुन रखा था शहर के बारे में, उस से