उसको ऐसा लगा था कि बात बहुत लम्बी चलेगी, दुर तक जाएगी, अपना ज्ञान बघारूंगा, इधर-उधर की कुछ बातें करूंगा। सच और झुठ मिश्रीत बातों का प्रयोग करके , इसकी बोलती बंद रखुंगा और सामनेवाले के सामने स्वयं को श्रेष्ठ साबित कर दुंगा। ऐसी ही सोच ने सोचनेवाले को ग्रसित कर रखा था। अहंकार से पूरा मन-मस्तिष्क जकड़ा हुआ था। मगर आप जैसा सोचते हैं वैसा हमेशा नहीं होता है। सामनेवाले की चुप्पी ने सारा मामला ही उल्टा कर दिया था। अहंकारी सोच पर पानी फेर दिया था। व्यंग्य वाणों के प्रहार से भी विचलित नहीं हुआ और