बिल्कुल। आगे से हम इसे उसी पुस्तक की निरंतरता में लिखते हैं।🪷 जैन प्रतिक्रमण सूत्रमूल प्राकृत • शब्दार्थ • सरल हिन्दी अर्थ • भावार्थ • आत्मचिंतनसंकलन: Ashish Shahअध्याय 10इच्छामि खमासमणोप्रतिक्रमण में साधु-साध्वी अथवा गुरु के प्रति विनय और क्षमायाचना का यह महत्वपूर्ण पाठ है।मूल प्राकृतइच्छामि खमासमणो!वंदिउं जावणिज्जाए, निसीहिआए,मत्थएण वंदामि।विभिन्न जैन परंपराओं और प्रतिक्रमण-पुस्तिकाओं में इसके पाठ में थोड़ा अंतर मिल सकता है।शब्दार्थइच्छामि — मैं इच्छा करता हूँ।खमासमणो — क्षमा/विनयपूर्वक निवेदन।वंदिउं — वंदना करना।मत्थएण — मस्तक से/सिर झुकाकर।वंदामि — मैं वंदना करता हूँ।सरल अर्थमैं विनयपूर्वक वंदना करना चाहता हूँ।मैं श्रद्धा और नम्रता से अपना मस्तक झुकाकर वंदना करता हूँ।भावार्थइस सूत्र का