मिट्टी का दीपकवर्धमानपुर नाम का एक छोटा-सा नगर था। नगर के बाहर एक पुराना जिनालय था। सुबह होते ही वहाँ घंटियों की मधुर ध्वनि सुनाई देती और लोग भगवान महावीर के दर्शन के लिए पहुँचते। जिनालय के पास ही एक छोटी-सी मिट्टी की दुकान थी, जिसे सत्तर वर्षीय सेठ शांतिलाल चलाते थे।शांतिलाल के पास धन बहुत था, लेकिन जीवन सरल था। वे हमेशा कहते—“धन घर में रहे तो ठीक है, मन में आ जाए तो बंधन बन जाता है।”उनका सोलह वर्षीय पोता आर्यन उनके साथ रहता था। आर्यन बुद्धिमान था, पर उसे धन और प्रतिष्ठा का बहुत आकर्षण था। वह