अपना घर

      ट्रेन की सीटी ने रात की खामोशी को चीर दिया।गाड़ी एक हल्के झटके के साथ सरकी और फिर धीरे-धीरे प्लेटफॉर्म पीछे छूटने लगा। उमा खिड़की के पास बैठी थी। कुछ देर पहले तक वह अपने भीतर उठ रहे ज्वार को किसी तरह थामे हुए थी। उसने स्वयं को बार-बार समझाया था—रोना नहीं है। स्टेशन पर नहीं। लोगों के सामने नहीं लेकिन मन की भी अपनी एक सीमा होती है। ट्रेन ने गति पकड़ी और उमा के भीतर कुछ टूट गया। उसने दोनों हाथों से चेहरा ढँक लिया।आँसू हथेलियों के बीच से रिसने लगे। सामने बैठे एक यात्री