श्री सौभाग्य लक्ष्मी उपनिषद

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श्रीसौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् — सौभाग्योपनिषद् का प्रचलित पूर्ण नाम सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् है। यह ऋग्वेदीय शाक्त उपनिषद् है और इसमें श्रीलक्ष्मी-विद्या, योग, समाधि तथा नवचक्रों का वर्णन मिलता है। पाठ के तीन खण्ड हैं--प्रथम खण्डसौभाग्यलक्ष्मी-विद्या की जिज्ञासाहरिः ॐ॥अथ भगवन्तं देवा ऊचुः—हे भगवन्! नः कथय सौभाग्यलक्ष्मीविद्याम्॥अर्थदेवताओं ने भगवान् से कहा—हे भगवन्! हमें सौभाग्यलक्ष्मी की विद्या का उपदेश कीजिए।तथेत्यवोचद्भगवानादिनारायणः—सर्वे देवा यूयं सावधानमनसो भूत्वा शृणुत।तुरीयरूपां तुरीयातीतां सर्वोत्कटां सर्वमन्त्रासनगतांपीठोपपीठदेवतापरिवृतां चतुर्भुजां श्रियंहिरण्यवर्णामिति पञ्चदशर्ग्भिर्ध्यायेत्॥अर्थआदिनारायण भगवान् ने कहा—हे देवगण! सावधान होकर सुनो। श्रीलक्ष्मी का ध्यान उनके उस दिव्य स्वरूप में करना चाहिए जो तुरीय और तुरीयातीत है, श्रेष्ठ है, समस्त दिव्य शक्तियों से युक्त है और चार भुजाओं वाली है। श्रीसूक्त की