एक विचित्र डायरी

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एक  विचित्र डायरीलेखक: विजय शर्मा एरी(लगभग २००० शब्द)१५ मार्च २०१९आज रात फिर वही सन्नाटा है। कमरे में सिर्फ पंखे की आवाज़ और मेरी साँसों की आवाज़। डायरी खोलते हुए हाथ काँप रहे हैं। नहीं जानता कि इसे क्यों लिख रहा हूँ। शायद इसलिए कि कोई तो सुन ले, भले ही कागज़ ही क्यों न हो।मेरा नाम नहीं बताऊँगा। नाम तो सिर्फ एक लेबल है जो लोग देते हैं। मैं वही हूँ जो रात में सड़कों पर घूमता है, और सुबह अखबार में कोई नया नाम छपता है। लोग कहते हैं सीरियल किलर। मैं खुद को सिर्फ “वह” कहता हूँ।आज फिर