रावण की मृत्युशय्याज्ञान का अंतिम उपदेशलंका की धरती पर युद्ध की विभीषिका शांत हो चुकी थी।कुछ समय पहले तक जहाँ शंखनाद, धनुष की टंकार और योद्धाओं की गर्जना सुनाई दे रही थी, वहाँ अब एक गहरा सन्नाटा पसरा था। चारों ओर टूटे हुए रथ, बिखरे हुए अस्त्र-शस्त्र और युद्ध की विभीषिका के चिह्न दिखाई दे रहे थे।स्वर्णमयी लंका के आकाश पर सूर्य अस्ताचल की ओर बढ़ रहा था। उसकी अंतिम किरणें महलों के स्वर्ण-शिखरों को छू रही थीं, मानो प्रकृति स्वयं उस महान घटना की साक्षी बनकर मौन खड़ी हो।युद्धभूमि में रावण पड़ा था।वही रावण—जिसके नाम से तीनों लोक काँपते