चॉंद सिंदूरी आसमां में इतराने लगा था, बड़ी मनभावन जगह थी। निर्जन पहाड़ियों से होकर एक नदी एक छोटी सी बच्ची की तरह टेढ़ी - तिरछी होती हुई उछलती हुई बह रही थी ... नदी के किनारे पर खड़ी शर्लिन एकटक उस चॉंद के रूप को निहार रही थी, गोरे पांवों के कोमल तलवे से रेत को बेख्याली में ही कुरेद रही थी। पास ही एक पुरानी, आधी-अधूरी बनी इमारत नदी के गोद में अकेली खड़ी थी। चहुँ ओर एक अजीब सी वीरानी छाई हुई थी, सन्नाटा अजगर की तरह उसके छाती पर बैठा हुआ था। अभी कुछ लम्हा ही