संयोगिता की आँखें फैल गईं। उसने "वर्षा" के चेहरे को गौर से देखा। अब उसे समझ आया कि क्यों वर्षा का व्यवहार इतना बदला-बदला था। क्यों वह ईर्ष्यालु थी, और क्यों उसने संयोगिता को इस सुनसान जगह पर लाकर खड़ा किया था।संयोगिता (ठंडी आवाज में) बोली - असली वर्षा भाभी कहाँ हैं?वर्षा" हँसी। लेकिन यह हँसी वर्षा जैसी नहीं थी। यह एक ऐसी हँसी थी जिसमें नफरत और बदले की आग थी।"वर्षा" बोली - ओह! तो तुम पहचान गईं कि मैं वर्षा नहीं हूँ। हाँ, मैं वर्षा नहीं हूँ। मैं महक हूँ। राहुल की पत्नी।संयोगिता का दिल जोर से धड़का। राहुल की