सत्य, शून्यता और काल बुद्ध भिक्षापात्र लेकर खड़े होते हैं। उसका बाहरी अर्थ गरीबी या त्याग नहीं है। उसका संकेत अधिक गहरा है—“मेरा कुछ नहीं है, इसलिए मैं खाली हूँ।”लेकिन शायद मनुष्य यहाँ सबसे बड़ी भूल करता है।वह खाली पात्र को केवल खाली देखता है। वह नहीं देखता कि खालीपन ही सब कुछ धारण करने की क्षमता है।बीज दिखाई देने में छोटा है, लगभग कुछ नहीं; पर उसी “कुछ नहीं” में पूरा वृक्ष संभावित है। शून्य रिक्त दिखाई देता है, पर उसी से संख्या का पूरा विस्तार संभव होता है।इसलिए— जो स्वयं को कुछ नहीं समझने की क्षमता रखता है, वही अस्तित्व